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Saturday, October 22, 2016

कहाँ है मृत्यु : मेरी आवाज़ में

मेरे नाती गोविन्द की बहुत जिद थी कि मेरी आवाज़ में मेरी कोई रचना रिकॉर्ड हो और इन्टरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध हो.
उसकी मेहनत और आपके लगाव का नतीजा है मेरा यह पहला प्रयास.
आपके प्रतिक्रियाओं का आकांक्षी : धनेन्द्र प्रवाही

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Monday, December 22, 2014

बरमेश्वर बाबू: एक स्मरांजलि

बरमेश्वर बाबू: एक स्मरांजलि

                                                       -धनेंद्र प्रवाही

पिछ्ले दिनो मैं कुछ निजी कार्यवश डॉ0 गोविंद माधव के यहाँ गया हुआ था। वे उस समय अपने कम्प्यूटर पर स्व0 डॉ0 बरमेश्वर प्रसाद की जीवनी पर कार्यरत थे । उन्हों ने बताया कि जीवनी साहित्य के सृजन-सम्पादन का यह आयोजन डॉ0 उमेश प्रसाद........................औषधि विभाग, रिम्स, राँची की संकल्पना पर हो रहा है। तभी मुझे ज्ञात हुआ कि डॉ0 उमेश बरमेश्वर बाबू के सुपुत्र हैं।  
      “अ वर्दी सन ऑव अ वर्दी फादर्।  मेरे मुँह से सहसा निकल पड़ा, क्या संयोग है पिता ने जिस जीवन को युवावस्था में निराशा के गर्त से उबार कर जीवनरण के लिए सज्ज किया था उन्ही के सुयोग्य पुत्र ने उस जिंदगी की डोर को संध्याबेला में टूटने से बचा कर कर्मक्षेत्र में और कुछ वर्ष सक्रिय रहने के योग्य बना दिया । मेरी स्मृति के पन्ने आप से आप पलटने लगे।                                                          
                      इस विवरण को एक कहानी कहें या संस्मरण इसका निर्णय पाठकों पर छोड़ते हुए हम चित-सूत्र को वर्तमान से अतीत प्रांगण में पहुंचने का माध्यम बनाते हैं। सन 2009 के दिसम्बर का महीना था। मैं नासिका के रक्तस्राव Epistaxis की गम्भीरावस्था में रिम्स लाया गया था। मुझे उस समय रिम्स में अध्ययनरत गोविंद माधव ने हीं यहाँ लाया था। रिम्स पँहुचने के पूर्व बीमारी की चरमावस्था में मैं लम्बी बेहोसी में भी जा चुका था। तब मुझे ऐसा विश्वास हो चुका था कि अब मेरे अंतिम पड़ाव की दुरी चंद सांसों भर की है। पर ऐसा नहीं हुआ। डॉ0 उमेश प्रसाद के कुशल निर्देशन में इलाज के बाद पुनर्जीवन प्राप्त कर मैं आज उम्र के आठवें दशक की दहलीज पर दाखिल हूँ और अभी स्वस्थ एवं उद्यमशील हूँ। अस्तु इस प्रसंग को यहीं विराम देते हुए मैं आपको सुदूर अतीत के स्मृतिलोक में ले चलता हूँ। यहाँ हम मिलते हैं डॉ0 बरमेश्वर प्रसाद से जिन्हें उस समय बरमेश्वर बाबू के नाम से लोकप्रियता हासिल थी। आज से 35-36  साल पुरानी बात है। तब मेरी युवावस्था थी और मैं चार संतानो का पिता बन चुका था। दूसरे शब्दों में, दुनियादारी का गुरुतर भार मेरे कंधे पर आ चूका था और मुझे जीवन या कहें स्वस्थ जीवन की वाजिब जरूरत थी। विडंबना कहिए कि उस अवस्था में लंबी अस्वस्था के कारण मैं जीवन से ही निराश हो चुका था। मेरे अंदर असमय कालकवलित हो जाने की प्रबल आशंका घर कर चुकी थी।
     उन दिनो राँची आर0 एम0 सी0 एच0 के औषधि विभागाध्यक्ष डॉ0 बरमेश्वर बाबू का बड़ा नाम यश था। कोई उन्हे भारत का सबसे बड़ा डॉक्टर बताता तो कोई एशिया फेम का फिजिशियन कहता। मेरे स्वजन शुभेच्छु इलाज के लिए मुझे उनके ही पास जाने का परामर्श दे रहे थे।   
                                                           वह दुर्गापूजा के त्योहार का समय थ। सर्वत्र भक्तिमय वातावरण। सार्वजनिक उत्साह और अवकाश के दिन। मैं अपने अनुज(कामदेव नाथ मिश्र, अवकाश प्राप्त प्राचार्य प्ल्स-2, रातू, राँची) के साथ बरमेश्वर बाबू के आवास में पहुँच गया। आतुर के चित रहे ना चेतू...........पर्व त्योहार की व्यस्तता का कुछ भी ख्याल नहीं किया। कहावत है, अ हेल्दि माइंड इन हेल्दि बडी। जाहिर है लम्बी रुग्णता के कारण मेरा तन ही नहीं मन भी रुग्ण तो था ही। मैं अपनी ही दुश्चिंताओं में डूबा हुआ बुलावे की प्रतीक्षा में बैठा था। संयोग से लम्बी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। नाम धाम की औपचारिकता पुरी हुई तो मेरे जी में जी आया। “चलो डांट फटकार तो नहीं मिली कि इतने दिनों तक क्या कर रहे थे? अब दिखाने आए हैं...............?” मैं इत्मिनान हुआ “क्या हुआ पंडित जी! पुजे पाठ के दिन में बिमार पड़ गए?” ये आत्मीयता और सहानुभूति भरे शब्द डॉक्टर साहब के थे। सुनते ही क्षण मात्र में मेरा सारा कल्पित भय भाग गया। फिर तो मैं ने निर्भीक भाव से अपनी सारी व्यथा कथा सुना डाली। मुझे प्रेसक्रिप्सन थमाते हुए डॉक्टर साहेब ने शब्द कहे, “कहाँ मिश्रा जी! आपको तो कोई बिमारी है ही नहीं। जाइये पूआ-पूड़ी खाइये। दवा भी खा लीजिएगा। घूमते फिरते पूजापंडाल देखते निकल जाइये।“ उनके स्वर की सरलता और विनोदशीलता ने मुझे मुग्ध कर दिया। भूल ही गया कि मैं एक पुराना मरीज हूँ और इतने बड़े डॉक्टर के सामने हूँ।                           
                              बरमेश्वर बाबू के आवास से निकलते हुए मैं खुद को एकदम बदला हुआ महसूस कर रहा था। मेरे अंदर जिंदगी की उम्मीद जग गई थी। “इतने बड़े डॉक्टर ने कह दिया, कोई बीमारी नहीं है। “दवा दुकान पहुँचते हुए रास्ते में ही कामदेव ने भी मेरा मनोबल दृढ़ कर दिया था, आप अपने स्वास्थ्य को लेकर अब फालतू चिंता करना छोड़ दीजिए। जब डॉ0 बरमेश्वर प्रसाद कह दिए, आपको कोई बीमारी नहीं है तो नहीं है बीमारी।                                                               फिर भी दवा का बिल एकदम हीं छोटा देखकर मैं संदेह में पड़ गया। अपना असंतोष प्रकट करते हुए मैं नें जिज्ञासा की तो दवा दूकान वाले की झिड़की मिली, “ बरमेश्वर बाबू को दवा का नाम मालूम होता तभी तो सारी दवाएँ आपकी पुर्जी पर लिख देते? महाराज! जाइये जो दवा लिखे हैं सो खाइये। बरमेश्वर बाबू का पुर्जा है, बरमेश्वर बाबू का.............।“               
                                                आज एक लम्बा समय गत हो चुका है। दुनियाँ के नियमानुसार आम आधि-व्याधियाँ जीवन में आईं-गईं। रोग दुख हुए-मिटे। 2009 की निराशा से उबर कर नवजीवन की प्राप्ति की चर्चा हो चुकी है। वह एक अतीत जो उस दिन डॉ0 गोविंद के आवास में सहसा जिवंत हो उठा- डॉ0 बरमेश्वर प्रसाद के असामयिक निधन से पुरजन-परिजन समेत न केवल सारी राँची बल्कि उनके शिष्यों और उपकृतों की पूरी दुनियाँ ही बिलख पड़ी थी। कहते हैं राँची में शोकाकुलों का इतना बड़ा सैलाब देखा नहीं गया थ। और भी ऐसी विभूतियों की इति अपूरणीय क्षति कही जाती है।                                        
                       बरमेश्वर बाबू ने कितनो को नई जिंदगी दी । कितनो की दुनियाँ आबाद की।             कीर्तियस्य स जीवती, वे आज भी जीवित हैं।                               
    “मैन लिव्स इन डीड्स नाट इन इयर्स”  उस पुण्यात्मा के परिजन फुलें-फलें। दीर्घ जीवन प्राप्त कर सानंद लोक सेवा रत रहें।


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Friday, June 11, 2010

कौन सा बंधन !

चाँद सारी  रात रोता है! क्यों ?
कोई नहीं जानता
फिर भी चांदनी से
अमृत बरसाता है , बांटता है.
निःशब्द रात्रि में तारे चुपचाप
अश्रुपात करते हैं,
बर्फ बन जाती है.
गिरिराज से गंगा बह निकलती है.
कलियाँ और पत्तियां रात भर
भींगती है
पर,प्रभात होते ही
मधुर हास,और हवा से,
सुबास लुटाती है
धरती के सुगापंखी
आँचल के झलमल-झल मोतियों
से चिटक कर किरणों की लहरें
लहराती हैं
साथ ही व्याकुल
सूरज अपनी सुसुम रेशमी
रुमाल से नेह-छोह   के भीगे गाल
सप-सप पोंछता है
सारे  संसार का रूप ताज़ा और मनोहर हो जाता है
और जीवन में सुरस
बिहान का गीत  भर जाता है
कहीं कोई बंधन दिखाई भी नहीं देता 
सब किस चीज़ से बंध जाते हैं
जड़ जंगम मात्र के ह्रदय 
प्राण एक कैसे हो जाते हैं!

कव्यगंगा,ranchi express ,११/१२/२००५ को प्रकाशित 

सुख-दुःख

दर्द कितना भी बड़ा हो
चाहे किसी का भी हो
बाँट लेने के लिए ही
किसी  को भेजा गया है
पूछता है कवि तुम्ही से
तुमने किसी का दर्द बांटा  है कभी?
.....
ख़ुशी कितनी भी बड़ी हो
आई कहीं से भी
बाँट देने के लिए ही
किसी से तुमको मिली है
पूछता है कवि तुमसे
तुमने किसी को ख़ुशी बांटी   है कभी?
...
मिली यह जिंदगी जो है
जितनी भी बड़ी हो
सुख-दुःख दोनों के लिए है
समभाव से सुख-दुःख को
पूछता है कवि तुम्हीं  से
तुमने अभी तक क्या  न बांटी  ज़िन्दगी?


कव्यगंगा,रांची एक्सप्रेस,४/०९/२००५ को प्रकाशित

Thursday, June 10, 2010

फूल और खाद

एक फूल के खाद होने
और खाद के पुनः फूल बन जाने की प्रक्रिया
बहुत जटिल है मित्र!
अस्तित्वहीन मृत्यु का आकल्पन
इसी जटिलता की कोख में जीता है!
.........................
फूल की तरह खाद भी जीवित है
प्राण दायीनी है.
जीवन उसमे किन्तु प्रच्छन्न है
आकर्षणहीन.
और फूल साक्षात् जीवन है
रूप-रस-संपन्न.
उसमे शैशव ,कैशोर्य और  यौवन  का
आह्लाद है
प्रत्यक्ष रुपाकर्षण और आमंत्रण है.
फूल में सृष्टि की संभावनाएं मूर्त हैं
..............................
अदृश्य है खाद की अमृत चेतना
प्रथम दृष्टया अकल्पनीय भी ..
किन्तु इस चेतना के उर्ध्व-गमन की
अंतिम परिणति है पुष्प की सुगंध.
............................
प्रसून की जरा भी विकर्षित करती है ...
और झर-झर झर  कर
खाद बनते है कुसुम जर्जर
पुनः रससिक्त होते हैं.
...................
अक्षय उत्स है जीवन-रस
जो बनाता है एक वृत
प्रवहमान  परिधि अविरल
प्रच्छन धार आविष्ट
शाश्वत.
...........
तल्लीन अंतर खाद का
बहिरंग गौण हो जाता है
कदाचित मलिन
विकर्षक और बदबूदार भी.
............
तो तुम कैसे विभेद करोगे मित्र
खाद और कलियों में
कीच और कमल में
मृत्यु की रिक्ति कहाँ मिलेगी तुम्हे?
..............
फूलों का झड जाना
उनका मर जाना तो नहीं है!
संघनन है प्राण का
सरूप उद्भव के लिए
एक सुखद सुषुप्ति है!
.................
जीवन का सातत्य
कहीं बाधित नहीं होता .
नहीं होता है खंडित .
मृत्यु नहीं है मित्र !
किसी क्षणांश में भी नहीं.
सतत है जीवन
केवल जीवन!
........

शाकद्वीपीय मग्बंधू त्रैमासिक पत्रिका,रांची ( अप्रैल-जून २००५) में prakasit