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Saturday, October 22, 2016

कहाँ है मृत्यु : मेरी आवाज़ में

मेरे नाती गोविन्द की बहुत जिद थी कि मेरी आवाज़ में मेरी कोई रचना रिकॉर्ड हो और इन्टरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया के लिए उपलब्ध हो.
उसकी मेहनत और आपके लगाव का नतीजा है मेरा यह पहला प्रयास.
आपके प्रतिक्रियाओं का आकांक्षी : धनेन्द्र प्रवाही

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Tuesday, August 20, 2013

चल रे टमटम


चल रे टमटम 

साइठ बछर लंबा डहर 
कय कोस
नी जानोंन 
जानोन 
साइठ बछर लम्बा डहर 


दू बछर कर छऊआ 
बाप हर बिगे खोजे 
मांय कर अंचरा में 
का करो मांय 

मांग कर लाल बिछरत हे 
कोइख कर लाल पिछरत हे 

झेन्झरो अंचरा मांय कर 
सेकरे छाईह तर 
रउद अंधड़ 
बरखा झईर 
किटी किटी पाला 

बीत गेलक कोनो रंग 
सतरह गो जेठ 
सतरह गो हथिया 
ओतने पूस 
कान्हो हेराल रहे फागुन 
जोताय गेलक टमटम में 
नावां बछेड़ा 
कतना सवार 
कतना असबाब 
देहाती संडक 
गाडी कर रोबाब 
जवानी कर शान 
चाइल 
करे लाग्लक गान 
चल रे टमटम 
चल चल चल 

धइन देह आइज ले 
राखले तो मान 
एहे रंग संग देह 
नझो जात प्राण 

ले पार तो लगाम फेइर 
काइल होत  बिहान
ख़ुशी मने कईर पार  तो 
फेइर प्रयाण गान 

चल रे टमटम 
चल चल चल 
 
  [अगम बेस: page no. 36 . नागपुरी काव्य संग्रह] 

परकाला


कईसन  सुन्दर रहे
हाथ में परकाला 
चेहरा के संगे संग 
लील अकास 
हरियर धरती 
सघन बन 
झरना नदी 
खान खदान 
फैक्ट्री मनक चिमनी मन 
रीझे रीझे हूलकत रहयं 
कतई कतई बात कान में
 कहत रहयं
लोभावान 
सोहावन 
मनभावन 

***

का रंग गिर गेलक 
कईसन दरईक गेलक 
मुंहक छवी छितिछान 
संगे धरती आसमान 
छाकछुन भे गेलक 
भेन्सुवावान 
डरडरावन 
मनतोरन

[चोरेया , 2005 पृष्ठ ३२ अगम बेस ]   

Tuesday, May 14, 2013

ग़ज़ल




पछिमे से का आलक हावा 
घरे आब बाज़ार भे गेलक।

मोल -तोल  हय डेग -डेग  में 
रिसता कार-बार भे गेलक।

दारु किडनैप लंगापन तो 
युग कर संसकार भे गेलक।


बुढ़वा घर कर होल संतरी 
छौंड़ा तो फरार भे गेलक।

आइग लागलक का बन में 
चन्दन तक अंगार भे गेलक।

              [अगम बेस: page no. 65. नागपुरी काव्य संग्रह] 

कहाँ हय मिरत !!!

कहाँ हय मिरत !!!




ई मउराल फूल!
मोइर गेलक का?
एहे तो खिलल रहे
रीझे- रीझे हावा संगे
झुमत रहे डाइर में
एहे तो बांटत रहे
दसो दिसा में
रूप -रंग -गंध कर सन्देश
आब जीउ छोइड देलक का ?
से लेगिन झरतहे !


इकरे जइर  तरे
झरल फुलकर  ओदा माइंद
फुनगी तक बुदा में
अमरित रस भरत हे
नावां कलि के आइंख ओगल
गते गते उघरत हे !

हेठे जीयत  माइंद  गुम-सुम
उपरे मह- मह फूल
तरे -उपरे
उपरे -तरे
जिनगी कर रसवंती
धारा अटूट
भीतरे -भीतर
कले -कल
लुक्ले-लुकल बहत हे!

माइंद में जीउ रस
खिलल फूल में जिनगी
कहाँ केजन मिरतू ह्य फूल में कि माइंद  में
कहूँ तो नइ दिसत हे !!


 [अगम बेस: page no. 35. नागपुरी काव्य संग्रह. nagpuri translation of his own Hindi poem 'फूल और खाद '] 

Monday, May 13, 2013

फूल मूल कर बात






से दिन कहे लागलक फूल जइर से 
'खाद में गड़ाल  हिस कोन तप कईर के ?'
धरती से जइर हँसलक , 'ना कर  ताव '
फिन तो हिंये आबे अइत ना अगराव।

काँइप उठलक डर  के मारे फूल  थर थर 
झइर गेलयं तखने कतइ पाँख झर झर 
छाती लगाय कहलक जइर ठिनक भुइयाँ 
'रूप -रस -गंध  के हय खान एदे हिंयां।।

 [अगम बेस: page no. 68. नागपुरी काव्य संग्रह] 

Thursday, April 4, 2013

कवर पेज :अगम बेस, नागपुरी काव्य संग्रह


बोध




तोर सपना सच ना होलक।
उ सपने रहे
से आइन्ख से रहे बड़
टूटबे  करतलक
टुईट  गेलक.

ना बह लोर
तोयं आपन  घर के ना छोड़
बाहरे हेराय जाबे
बाला अगम तातल हय
गरीब कर जिनगी तइर
छान के छनइक जाबे

एक तो आँख अपने सुकुवार
सेकर देखल सपना
आउरो सुकुवार
उकरो ले सुकुवार
आँइखक लोर

सुन,
दरइक गेलक सपना
तो ना ढरक
ना बरिस
तोंय आँइखे में रह
तोके
और कहाँ मिली  ठौर

तोर लेगिन गीता कर उपदेश
सुख-दुःख लाभ -हाइन के
बरोबइर बुइझ-जाईन के
ज्ञानी होय के रह

नइ  मिललक सुख
नइ हांसले
नइ गाले
दुःख तो पाले नि पूरा.
इकर से नइ हारबे
इकर से नइ हेराबे
तो स्थितप्रज्ञ होय जाबे
अरे भाइ
आधा तो अधे सही.

 
[अगम बेस: page no. 28. नागपुरी काव्य संग्रह]