Showing posts with label nature. Show all posts
Showing posts with label nature. Show all posts

Friday, September 7, 2012

आज पूनम है।

आज पूनम है।
दूध सी उजली
 निशा शोभित
पवन गमन वश दोलित
तरुपत्र कर इंगित
पा-पा प्रचलित
चांदनी ज्यों तड़ित
अस्थिर मरुत
अवर्णनीय कलित
सुरभित जग है।

आज पूनम है।

सरसिज संकुचित
कुमुदिनी प्रस्फुटित
सरजल विचलित
लहरी अकथित
कौमुदी आभासित
मुकुरवत विरचित
विदयुतरेख जलगत
अकथ्य छवि अनुगत
कसार में कवी है।

आज पूनम है।


first poem by poet dhanendra prawahi.
it was written around 1961, by this time he was just 15 year old ,
 a student of class 8. 

Friday, June 11, 2010

कौन सा बंधन !

चाँद सारी  रात रोता है! क्यों ?
कोई नहीं जानता
फिर भी चांदनी से
अमृत बरसाता है , बांटता है.
निःशब्द रात्रि में तारे चुपचाप
अश्रुपात करते हैं,
बर्फ बन जाती है.
गिरिराज से गंगा बह निकलती है.
कलियाँ और पत्तियां रात भर
भींगती है
पर,प्रभात होते ही
मधुर हास,और हवा से,
सुबास लुटाती है
धरती के सुगापंखी
आँचल के झलमल-झल मोतियों
से चिटक कर किरणों की लहरें
लहराती हैं
साथ ही व्याकुल
सूरज अपनी सुसुम रेशमी
रुमाल से नेह-छोह   के भीगे गाल
सप-सप पोंछता है
सारे  संसार का रूप ताज़ा और मनोहर हो जाता है
और जीवन में सुरस
बिहान का गीत  भर जाता है
कहीं कोई बंधन दिखाई भी नहीं देता 
सब किस चीज़ से बंध जाते हैं
जड़ जंगम मात्र के ह्रदय 
प्राण एक कैसे हो जाते हैं!

कव्यगंगा,ranchi express ,११/१२/२००५ को प्रकाशित 

तुम्हारी मर्ज़ी!

सूरज रोज़ उगेगा
काट  कर अँधेरा
ज्योति,प्राण,उर्जा से भर देगा
वसुधा के अणु-अणु को
अब तुम अणुओं के बम बनाकर
रोज़ बनाओ नागासाकी
हिरोशिमा...
......तुम्हारी मर्ज़ी .
.....
मां वसुंधरा तुम्हे पोसेगी
अनंतकाल तक
जल,जीवन,धन,अन्नराशि  से
अब  तुम  इसकी  कोख  में  ही
ज़हर मिला दो
...तुम्हारी मर्ज़ी!
...
ये लता-पत्र-तरु,मौन-मित्र ये
प्राण दे रहे,त्राण दे रहे
अब तुम इनकी जड़े खोद कर
खाक बना दो
...तुम्हारी मर्ज़ी!
......
गंगा,नील,दोन,ह्वान्ग्वो
जीवन इसमें सदा प्रवाहित
भर-भर अंजुरी पान करो
या गरल बना कर
मरू में अपने प्राण तजो तुम
ज्यों हिरनामन
...तुम्हारी मर्ज़ी!
.......


कव्यगंगा,रांची एक्सप्रेस,५/१२/२००४ को प्रकाशित

Thursday, June 10, 2010

फूल और खाद

एक फूल के खाद होने
और खाद के पुनः फूल बन जाने की प्रक्रिया
बहुत जटिल है मित्र!
अस्तित्वहीन मृत्यु का आकल्पन
इसी जटिलता की कोख में जीता है!
.........................
फूल की तरह खाद भी जीवित है
प्राण दायीनी है.
जीवन उसमे किन्तु प्रच्छन्न है
आकर्षणहीन.
और फूल साक्षात् जीवन है
रूप-रस-संपन्न.
उसमे शैशव ,कैशोर्य और  यौवन  का
आह्लाद है
प्रत्यक्ष रुपाकर्षण और आमंत्रण है.
फूल में सृष्टि की संभावनाएं मूर्त हैं
..............................
अदृश्य है खाद की अमृत चेतना
प्रथम दृष्टया अकल्पनीय भी ..
किन्तु इस चेतना के उर्ध्व-गमन की
अंतिम परिणति है पुष्प की सुगंध.
............................
प्रसून की जरा भी विकर्षित करती है ...
और झर-झर झर  कर
खाद बनते है कुसुम जर्जर
पुनः रससिक्त होते हैं.
...................
अक्षय उत्स है जीवन-रस
जो बनाता है एक वृत
प्रवहमान  परिधि अविरल
प्रच्छन धार आविष्ट
शाश्वत.
...........
तल्लीन अंतर खाद का
बहिरंग गौण हो जाता है
कदाचित मलिन
विकर्षक और बदबूदार भी.
............
तो तुम कैसे विभेद करोगे मित्र
खाद और कलियों में
कीच और कमल में
मृत्यु की रिक्ति कहाँ मिलेगी तुम्हे?
..............
फूलों का झड जाना
उनका मर जाना तो नहीं है!
संघनन है प्राण का
सरूप उद्भव के लिए
एक सुखद सुषुप्ति है!
.................
जीवन का सातत्य
कहीं बाधित नहीं होता .
नहीं होता है खंडित .
मृत्यु नहीं है मित्र !
किसी क्षणांश में भी नहीं.
सतत है जीवन
केवल जीवन!
........

शाकद्वीपीय मग्बंधू त्रैमासिक पत्रिका,रांची ( अप्रैल-जून २००५) में prakasit

कतिपय कोंपलों के अर्थ

ये कुछ कोंपल जो हैं .
स्तंभों से खड़े
जराधीन पेड़ों पर भी
कहीं कहीं
साकांक्ष उग आईं .
ताम्र  वर्ण की कोंपलें .

ये अकिंचन नहीं
अतीतप्राय  की वर्तमान से
भावमयी अपेक्षाएं हैं.

कोई तो देखे
नीरस में विलास
प्रकट हो
सहृदय का उदगार
'नीरस तरुरिह विलसति पुरतः'
और कादंबरी कादंबरी हो जाये..
.
ये कतिपय कोंपलें
ये सुकोमल सूचनाएं हैं
की शुष्क भी तरु
उपेक्षनीय नहीं कोई
लोचन चाहिए. मन चाहिए,

गतायुप्राय  वृक्षों का
सुख जाना तो
सघन होते तरल तत्व का
ठोस हो जाना भर है.

सृष्टि-सेवा-कर्म चिर हो
इस निमित
सुखी समिधा बन जाना
या आकाश में खिलने के लिए
बारूद तक हो जाना भी है.

ये मंत्रसिक्त आहुतियों की
संजीवनी सुगंध
दिगंत में फैला दें
फुलझड़ियाँ बन फूलों की
नयनाभिराम  झड़ी लगा दें.

ये कतिपय कोंपलें
दृढ विस्वास भरे.
सत संकल्प सजे
रसग्राही उत्साही
कर्म कुशल  योगी युवजन के
सम्मुख लहरातीं
परीक्षाएं हैं.

जीवन संध्या की
युवा प्रभात से
स्नेहमयी अपेक्षाएं हैं.
ये कतिपय कोम्पलें ....



pushpanjali,choreya, ranchi
भास्कर मग्बंधू (जनवरी-जून २००६ संयुक्तांक) ,रांची में प्रकाशित